घमंड का फल – ( ghamand ka phal) – Hindi Kahani

 

घमंड का फल Hindi Kahani:-

 
किसी गाँव में एक किसान था। उसका नाम बिरजू था। उसका एक पुत्र था जिनका नाम संतोष था। बिरजू को जंगल के उस पार बसे गाँव रामपुर जाना था। उसके साव उसका पुत्र संतोष भी था । जंगल के टेढ़े-मेढ़े रास्तों को लॉघते सारा दिन निकल गया, उने गाँव दिखाई नहीं दिया। पिता-पुत्र रास्ता भटक गए और अब वे ऊपर किसी रासते से जात और नीचे दूसरे से आते मगर नीचे पहुंचकर वे पाते जहाँ से उन्होंने ऊपर चढ़ना शुरू किया था उसी स्थान पर पुनः आ गए हैं। 
 
घमंड का फल - ( ghamand ka phal) - Hindi Kahani
 
    उन्हें रास्ते का सही अंदाजा नहीं लग रहा था । यहाँ तक कि वापस अपने गांव लौटने की वे सोच रहे थे मगर गाँव का रास्ता भी समझ में नहीं आ रहा था। वे भटते रहे। इसी बीच सूर्यास्त का समय हो गया। सूर्यास्त का अंदाज लगा पिता-पुत्र भयभीत हो गए उन्होंने इधर-उधर दृष्टि दौड़ाई। उन्हें दूर-दूर तक जंगल-ही-जंगल दिखाई दिया। वे सोचने लगे कि अब जंगली जानवर हमें खा जाएंगे। मृत्यु के डर ने उनमें दहशत पैदा कर दी थी। वे पुनः जंगल में इस आशा और विश्वास के साथ भटकने लगे कि कोई-न-कोई गाँव दिखेगा । मगर कोई गांव तो दिखा नहीं । हाँ, जंगल से थोड़ा नीचे समतल भूमि में एक मकान अवश्य दिखा। पिता-पुत्र ने सोचा कि उस मकान में कोई-न-कोई रहता ही होगा। वे उस मकान की ओर बढ़ चले। मकान के पास पहुंचकर उन्होंने देखा कि दरवाजा बंद है। उन्होंने सोचा कि मकान मालिक कहीं गया होगा। वे बाहर ही बैठकर मकान मालिक का इन्तजार करने लगे बहुत देर तक कोई नहीं आया तो दरवाजा खोलकर वे भीतर घुस गए। वहां उन्होंने बर्तन देखा।कुछ खाना मिल जाने की नीयत से उन्होंने बर्तनों को टटोला । मगर कुछ नहीं मिला। इससे वे निराश हो गए अचानक उन्होंने देखा कि बंदरों का एक दल उन्हीं की ओर बढ़ा चला आ रहा है। वे भयभीत हो गए औरा छिपने की व्यवस्था में लग गए। वहां एक कोठी थी वे उसी में घुए गए। बंदरों के दल ने जैसे ही मकान में प्रवेश किया तो पिता-पुत्र को लगा कि बदरों ने उन्हें देख लिया है और अब वे उन्हें खाकर रहेंगे। मगर बंदरों ने उन्हें देखा नहीं था। दरअसल, यह मकान बंदरों का ही था। वे रात्रि का भोजन इसी मकान में बनाकर खाते थे। बंदरों ने चूल्हा जलाया और खीर बनाने लगे खीर की सुगंध पिता-पुत्र के नाक में घुसने लगी। वे भूखे तो थे ही सगंध ने उनकी भूख और बड़ा दी। विचारों में ही वे खीर का स्वाद चखने लगे, मगर पुत्र को कुछ ज्यादा ही मजा आ रहा था। उसने अपने पिता के कान में कहा-“मुझे जोरों से भूख लगी है बंदरों से खीर मांग क्या?”
 

 

तुम पागल हो गए हो क्या? बंदरों को यहाँ हमारी उपस्थिति की भनक मिल गई तो वे हमें जिंदा नहीं छोड़ेंगे। पिता ने उपटते हुए कहा । यह सुनकर पुत्र कुछ क्षण चुप रहा। उसके बाद उसके पुनः पिता से कुछ कहा। पिता को पुत्र पर क्रोध आया मगर वे साहस नहीं कर पाए। यदि वह क्रोधित होकर पुत्र को डांटते तो पुत्र रो पड़ता और भाडा फूट जाता। इसी आशका के कारण पिता ने डाँटने के बजाय उसे समझाना उचित ममझा। समझाने पर भी पुत्र से नहीं रहा गया और उसने बंदरों से कह ही दिया। हमें भी खीर दोगे क्या?

 

 

 

आवाज बंदरों तक पहुंची। बंदर सकते में आ गए। वे खीर बना चुके थे और अब खाना चाहते थे। जब पुत्र ने फिर आवाज लगाई कि हमें भी खीर दोगे क्या, तो बंदर भयभीत हो गए और खीर खाना ही भूल गए। वे मकान छोड़ भाग खड़े हुए। बंदरों को भागते देख उनके मुखिया बंदर ने पूछा, तुम लोग इस तरह कहाँ भागे जा रहे हो?

 

 

 

हमारी मानो और तुम भी भागो । एक बंदर ने रुककर कहा-“अरे रुको भी उनमें से एक ने कहा-“हमारे मकान में दैत्य घुस आया है।” हमलोग सच कह रहे हैं । लगभग सभी बंदरों ने एक साथ कहा-“चलो तो, में भी दे भला उस दैत्य को ।” नहीं नहीं हम नहीं जाएंगे वहाँ पर । तुम लोग बिल्कुल डरपोक हो। देते तुम लोगों का कुछ नहीं बिगाड़ेगा। चलो, मैं तुम लोगों के साथ हूँ। मुखिया ने पमण्ड के साथ कहा। मुखिया बंदर की बात मानकर सभी बंदर वापस हो आए। उनके आगे-आगे मुखिया बंदर चलने लगा। मकान के सामने पहुंचकर बंदर पुनः रुक गया उन्हें रुकते देख मुखिया बंदर ने कहा-‘अरे तुम लोग वहाँ क्यों रुक गए? आओ इधर.मुखिया बंदर मकान में घुस गया। उसके साथ साथ अन्य बंदर भी अंदर घुस गए। उन्होंने देखाकि जो खीर उन्होंने बनाई थी । उनमें से कुछ हिस्सा गायब है। वे और डर गए। उन्हें विश्वास हो चला कि जरूर दैत्य खा गये होंगे। मुखिया ने देखा कि बंदर अब भी भयभीत है तो रौब झाड़ते हुए कहा-“तुम लोग मेरे रहते बिल्कुल मत डरो। एक क्या हजार दैत्य भी आएंगे तो मैं उन्हें परास्त कर सकता हूँ। इतना कहकर वह एक कोठी के ऊपर जा बैठा जहाँ पिता-पुत्र घुसे थे।”

 

 

 

बंदर को कोठी के ऊपर बैठा देख पिता के प्राण ही निकलने को हुए, पर पुत्र आनन्दित हुआ। मुखिया बंदर की पूंछ उन तक पहुंच रही थी। यह देख पुत्र ने कहा-“पिताजी बंदर की पूंछ पकडूं क्या ?” पिता ने माथा ठोकते हुए कहा-“अब तो लगता है कि तुम हमारे प्राण निकलवा कर ही चैन की सांस लोगे “

 

 

 

पुत्र ने पिता की बात अनसुनी कर दी। उसने पूंछ पकड़ ली। पूँछ पर स्पर्श होते ही मुखिया बंदर ने कोठी से कूदना चाहा, मगर उसकी पूंछ अब पिता-पुत्र दोनों ने पकड़ रखी थी। इसलिए वह पूछ छुड़ा नहीं सका और जोर-जोर से खों-खों चिल्लाने लगा। मुखिया को विपत्ति में बंदर ने पूंछ छुड़ाने के लिए झटका दिया मगर बंदर की पूँछ छूटी तो नहीं अपितु टूट गई। मुखिया बंदर भी अपने प्राण लेकर वहां से भाग खड़ा हुआ। अन्य बंदर कुछ दूर बैठे थे। उन्होंने मुखिया बंदर की पूंछ टूटी देखी। उसमें से रक्त बह रहा था, तो एक बंदर ने सामने आकर कहा-“आपको अपनी शक्ति पर बहुत घमंड था ना उसी का फल है।” फंसा देख सभी बंदर खीर का पात्र वहीं पटक प्राण लेकर भागे । मुखिया

 

 

 

हाँ भाई हाँ, मैंने झूठे घमण्ड में आकर खुद को शक्तिशाली समझा घमण्ड कभी नहीं करूंगा। यह मेरे घमण्ड का ही परिणाम है और उस दिन से मुखिया बंदर सामान्य बंदरों के समान रहने लगा अब यह अन्य बंदरों को कमजोर व खुद को शक्तिशाली घोषित नहीं करता था। 

 

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